कुछ पल के लिए ही सही,
पर वोह भी क्या पल थे।
जब मैं सिर्फ़ मैं हुआ करता था।
ज़िन्दगी को बादलों में शेर खरगोश
ढूँढने से फुर्सत ही कहाँ मिलती थी।
कुल्फी वाले की घंटी से
शाम की नींद खुलती थी।
हमारी वह छोटी सी गली ही
हमारी सल्तनत थी,
और हम वहां के सिकंदर।
और तब घर से जलेबी के लिए पैसे मिलना,
जंग जीतने के बराबर था।
दादी से मीठी मिश्री के प्रसाद के लिए
अपने भाई से लड़ना आज भी याद है मुझे।
वक्त वक्त की बात है,
अब न दादी रही, न ही वोह सपनों का घरौंदा
जिसके टूट जाने पर भी गम न होता था।
बल्कि अगले दिन और भी खूबसूरत
स्वप्न नगर खोजने की कोशिश रहती।
वाकई, कभी कभी उन पलों को
समय की गुल्लक में से चुरा लाने का मन करता है।
मन करता है खींच लाऊँ उन सभी लोगों को,
उनके कशमकश भरे जीवन में से,
और पूछूं की मेरे कुछ ख्वाब, कुछ मुस्कुराहटें
उनके किसी पुराने बक्से में तोह नहीं?
बीते लम्हे
Friday, June 26, 2009 at 1:45 AM लेखक Piyush Aggarwal
एक नए जहाँ की खोज में
Friday, May 15, 2009 at 1:32 PM लेखक Piyush Aggarwal
इतने अरसे बाद कितना अच्छा लग रहा है, ख़ुद से बातें करना, कुछ बीते लम्हों के बारे में सोचना, बिना किसी चिंता के। शायद पिछले दिनों में कहीं खोया हुआ था। जानते हुए एक अनजान सड़क पे निकल चला था। तोह ऐसे में गुमना तोह तय था। आज ख़ुद से वापस मुलाकात हो रही है। जनाब एक बात तो बताओ, नौकरी छोड़ के कैसा लग रहा है? सच कहूं तो थोड़ा खालीपन है, पर शायद यह खालीपन ज़रूरी था। अब तो लगता ही की इस उलझी हुई ज़िन्दगी को सुलझाना, अपने अतीत को आखिरी बार देखना, और एक खूबसूरत भविष्य की ओर रुख करना ही मेरा कर्म है, फ़िर चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यूँ न हो। और जानते हो इस बार मैं एक आम इंसान की तरह परिस्थितियों से समझौता कर लेना चाहता हूँ। आज, अभी बल्कि इसी पल से अपनी ज़िन्दगी के हर पल को खुल के जीना चाहता हूँ।
शायद खुशियाँ यहीं कहीं छुपी बैठी होँ,
अरे दोस्त सुन तो ज़रा,
इस नटखट ज़िन्दगी को थोड़ा गुदगुदा जा,
मैं इसे ज़ोर से ठहाके मारते देखना चाहता हूँ।
देखूं तो ज़रा,
मुस्कुराती ज़िन्दगी अब भी वैसी ही खूबसूरत दिखती है,
जैसी की बचपन मैं दादी की गोद मैं देखा था?
खुशियाँ, मूल्य - मात्र ११ रुपये
Wednesday, April 22, 2009 at 2:39 PM लेखक Piyush Aggarwal
न जाने क्यूँ पर कई सालों बाद कल एक ख्याल मन मैं आया, बस ख्याल आते ही मैं उठ खड़ा हुआ और चल पड़ा। पिछले कई बरस से मैं अपने पुराने दोस्त से नहीं मिल पा रहा था, या यूँ कहूं की जीवन की भाग दोड़ में कहीं भुला बैठा था। अक्सर हमारी ज़िन्दगी में ऐसा होता है की हम उन कुछ छोटी छोटी बातों को भूल जाते हैं जिनसे हमारी अस्तित्व जुदा होता है। मेरा यह दोस्त भी मेरे अस्तित्व के किसी हिस्से से जुडा हुआ है और उसे मैं कभी अलग नहीं कर सकता।
बचपन में शायद ही कोई मंगलवार बिना इसे मिले बिना गया हो। गर्मी, बारिश, सर्दी, न मौसम और न ही वक्त मुझे रोक पाया इससे मिलने से। हर मंगल की शाम को मैं और मेरे अन्य दोस्त, हम सब झुंड बना के इन जनाब के घर इनके पसंद की बूंदी लेकर पहुँच जाते। फ़िर तोह इन इनके चेहरे पे खुशी की चमक देखने लायक होती थी। वोह दिन था और आज का दिन था, मेरे भूलने के बाद भी वोह हमेशा मेरे आस पास ही रहा, हर दुःख सुख में मेरी शक्ति और हौसला बढ़ता रहा, एक अनकहे एहसास की तरह।
मैं यह बात किसी से नहीं कहता पर आज सब को बताने का मन कर रहा है, मेरे उस प्यारे दोस्त का नाम है - हनुमान। लोग इन्हे भगवन कहते हैं, पर इन जनाब की बात ही कुछ और है। प्यार बांटना, लोगों में प्यार बढ़ाना, शायद इनकी फितरत में शामिल है।
आप ही सोचिये, ११ रुपये की उस बूंदी के लिफाफे के ज़रिये हम कितने दिलों में जगह बना लेते हैं, कितनी जिंदगियों में खुशी बाँट लेते हैं। लोग जिसे प्रसाद मानते हैं , मेरे लिए वोह हनुमान का प्यार है जिसे वोह मेरे माध्यम से अपने भक्तों में बाँट लेते हैं। मेरे लिए वोह ११ रुपये की खुशी वाकई में अनमोल है जिसे मैं हर मंगलवार को बांटूंगा। आप भी आईये और ११ रूपये में अनमोल प्रेम पाईये।
होली है!
Tuesday, March 10, 2009 at 4:03 PM लेखक Piyush Aggarwal

भंग का रंग भी चढेगा फिरसे,
रंग से ज़ंग भी होगी फिरसे,
रूठों को दोबारा मनाने का मौसम आया है,
हजारों खुशियों में नहाने का दिन आया है।
खड़ा है वृन्दावन तेरी राह में,
चेहरे पे रंग लगाने की चाह मे
उन भीगी गलियों में गुम जाने का दिन आया है,
लो होली मनाने का दिन फ़िर आया है।
फुर फुर फुर फुर
Monday, February 16, 2009 at 12:47 PM लेखक Piyush Aggarwal
उड़ना मुझे पसंद है,
सूरज के सातों घोडों को
हवा के पंख लगा के उनकी सवारी करना,
एक विचित्र अनुभव है।
मनो मेरी कल्पना
कुछ पल के लिए बादलों के उस पार
खड़ी मुझपे मुस्कुरा रही हो।
अब तोह ऐसा लगता है की
इस निरंतर भागती कल्पना की गति
को रोक पाना काफ़ी कठिन है।
तनहा दिल तनहा सफर
Thursday, February 05, 2009 at 10:02 PM लेखक Piyush Aggarwal
विश्वास नहीं होता, एक बरस बीत गया हौज़ खास के इस खूबसूरत आशियाने में। यूँ मानो की कल की ही बात हो जब मैं पहले दिन यहाँ आया था। दिल में एक मायूसी सी न जाने कब से घर किए बैठी थी। वोह रात मैं कभी नहीं भूल सकता। ज़िन्दगी से बहुत सी उम्मीदें लिए मैंने इस घर में कदम रखा था। यह मेरे लिए एक कमरे से कहीं जादा है। इस घर की हर चीज़ मेरे अनगिनत खुशी के पलों को बयां कर सकती है। पिछले एक साल में मैंने बहुत कुछ पाया है और सबसे बेशकीमती चीज़ जो इस घर ने मुझे दी है, वोह है थोड़ा सा सुकून जो मुझे पिछले कई सालों में कहीं नहीं मिला। उन तनहा लम्हों में मैंने एक अजीब सी कशिश को महसूस किया है। यह एक साल मेरी ज़िन्दगी का सबसे अहम् साल रहा है, ख़ुद को पाने की खोज में जो मैं घर से निकला था, काफ़ी हद तक मैं पाने में कामयाब रहा हूँ। मुझे नहीं पता ज़िन्दगी यहाँ से कहाँ ले जा रही है, पर एक बात की बेहद खुशी है की मैंने इस छोटे से घर में अपनी खूबसूरत खयालो की दुनिया को पा लिया है।